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द रचयिता
हिंदी साहित्य की e-पत्रिका
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September 09, 2014
कोई अपना नहीं - A poetry on practical aspect of life
हम भूल जाते है ये सपना नहीं.
वाकई यंहा कोई अपना नहीं.
मै-मै की होड़,
फैली चहु ओर,
कोई उसके पीछे,
कोई इसके पीछे ,
हर ओर मची यंही शोर |
दिल तोरना,
दिल जोरना तो आम बात है.
एक सा न सबके जज्बात है.
मतलब की दुनिया है,
कुछ कहना नहीं.
वाकई यंहा कोई अपना नहीं.
-चंचल साक्षी
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